बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग से जुड़े 8 मिथक व सच्चाई (Bache ki toilet training ke 8 mithak aur sachai)

बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग से जुड़े 8 मिथक व सच्चाई (Bache ki toilet training ke 8 mithak aur sachai)

टॉयलेट का उपयोग सीखना बच्चे की ज़िंदगी का एक अहम पड़ाव होता है और उसे सिखाने के लिए माता-पिता हर संभव कोशिश करते हैं। इस दौरान उन्हें चारों तरफ से तरह-तरह की सलाहें मिलती रहती हैं, जैसे - बच्चे को जल्दी सिखाने के लिए ये करें, उसे इस तरह सिखाएं, बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग (toilet training in hindi) के लिए ये तरीका आज़माएँ, आदि।

अगर आप अपने बच्चे को शौचालय का उपयोग करना सिखा रहे हैं, तो यकीनन आपको भी अपने दोस्तों, जानकारों व रिश्तेदारों से ढेरों सुझाव मिल रहे होंगे। इस समय आपके लिए जितना ज़रूरी ये जानना है कि बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग (potty training in hindi) के लिए कौनसी जानकारी सही है, उतना ही ज़रूरी ये जानना भी है कि कौनसी बातें सही नहीं है और आपको उनका पालन नहीं करना चाहिए।

इस ब्लॉग में हम आपको बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग से जुड़े आठ प्रचलित मिथक बता रहे हैं, ताकि आप जागरूक बनें और अपने आसपास के बाकी लोगों को भी इन भ्रांतियों या मिथकों की सच्चाई से रूबरू करवाएं।

1. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: लड़कियां लड़कों की तुलना में जल्दी सीखती हैं।

(Ladkiya ladko ki tulna me jaldi sikhti hai)

potty training myths ladkiya ladko ki tulna me jaldi sikhti ha

सच्चाई- कई लोग मानते हैं कि लड़कों की तुलना में, लड़कियों को शौचालय का उपयोग सिखाना ज्यादा आसान होता है। यह बात पूरी तरह से सच नहीं है। भले ही आप लड़की को सिखा रहे हैं या फिर लड़के को, नतीजे लगभग एक समान ही होने चाहिए। कुछ कारणों (जैसे बच्चे को सिखाने का तरीका, उसे कौन सिखा रहा है आदि) से लड़कों को टॉयलेट का उपयोग सीखने में लड़कियों की तुलना में कुछ हफ्ते ज्यादा लग सकते हैं।

कुछ माता-पिता लड़के और लड़की को टॉयलेट ट्रेनिंग (toilet training in hindi) देने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं, इस वजह से भी दोनों को सीखने में अलग-अलग समय लग सकता है।

कई विशेषज्ञ तो यह भी मानते हैं कि लड़के, लड़कियों की तुलना में पेशाब व मलत्याग करने के लिए बाथरूम का उपयोग करना ज्यादा जल्दी सीखते हैं। उनके अनुसार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़के कहीं भी खड़े होकर पेशाब कर सकते हैं। हालांकि इस मामले में पुख़्ता तौर पर कुछ कह पाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि हर बच्चा बाकी बच्चों से अलग होता है और चीज़ों को अलग ढंग से सीखता है।

2. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: जब बच्चा तैयार होगा तो अपने आप शौचालय का उपयोग करना सीख लेगा।

(Jab bachha teyar hoga to apne aap toilet use karna sikh lega)

potty training myths

सच्चाई- कुछ लोग मानते हैं कि बच्चा शौचालय का उपयोग करने के लिए तैयार होने पर, अपने आप ये सब सीखने लगेगा। इस मिथक में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है। बच्चों को अपनी दिनचर्या में बदलाव कम पसंद होता है। ऐसे में, भले ही वो शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो जाएं, लेकिन उन्हें शौचालय का उपयोग करना आपको सिखाना पड़ेगा। अब तक शायद ही कोई बच्चा ऐसा होगा, जिसने अपनी इच्छा से शौचालय का इस्तेमाल करना शुरू किया हो।

हो सकता है कि बच्चा बाथरूम में जाना पसंद करता हो या फिर अक्सर टॉयलेट सीट पर बैठ जाता हो, लेकिन इसके बाद आपको उसे लगातार ऐसा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। तभी वो सही तरह से शौचालय का उपयोग करना सीख पायेगा।

इसलिए बच्चे के दो वर्ष का हो जाने के बाद, अगर आपको उसमें टॉयलेट ट्रेनिंग (potty training in hindi) के लिए तैयार होने के लक्षण दिखाई दें, तो आप उसे सिखाने की शुरुआत कर सकते हैं।

3. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: एक बार टॉयलेट का इस्तेमाल सीखने के बाद बच्चा कभी कपड़े खराब नहीं करेगा।

(Ek baar toilet training lene ke baad bacha kabhi kapde gile nahi karega)

potty training myths and truths

सच्चाई- इस मिथक के अनुसार अगर आपका बच्चा एक बार टॉयलेट का उपयोग करना सीख लेता है, तो वो फिर कभी अपने कपड़ों में पेशाब या मलत्याग नहीं करता है। दुर्भाग्य से, यह पूरी तरह से सच नहीं है। टॉयलेट ट्रेनिंग (toilet training in hindi) ले चुके बच्चे कई कारणों से दोबारा अपने कपड़े गीले करना शुरू कर सकते हैं। आमतौर पर ऐसा तनाव, दिनचर्या में अचानक बदलाव और बीमारी की वजह से होता है। साथ ही घर बदलना, पहली बार स्कूल जाना, ज्यादा थक जाना भी इसकी एक वजह हो सकती है।

इसके अलावा, आपका बच्चा दिन के समय बाथरूम में शौच करना सीख लेने के बाद भी, लम्बे समय तक रात को बिस्तर में पेशाब कर सकता है। अगर वो गहरी नींद में सोता है, तो ऐसा होने की आशंका ज्यादा होती है।

4. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: बच्चे को सिखाने के लिए आपको टॉफी-खिलौने जैसे ईनाम देने चाहिए।

(Bache ko sikhane ke liye apko use toffee aur khilaune dene chahiye)

potty training myths bache ko sikhana

सच्चाई- कई माता-पिता मानते हैं कि बच्चे को टॉफी-खिलौने आदि देने से वो टॉयलेट का उपयोग करना जल्दी सीखता है। यह बात पूरी तरह से सच नहीं है। हो सकता है कि टॉफी या खिलौनों के लालच में बच्चा टॉयलेट का इस्तेमाल करने लगे, लेकिन जब भी उसे ईनाम नहीं मिलेगा तो वह नाराज, परेशान और उदास होगा। इससे आपको बाद में ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

शौचालय का उपयोग सीखना भी खाना, चलना, बोलना सीखने जितना सामान्य है, बच्चे को ईनाम का लालच देकर इस प्रक्रिया को अलग ना बनाएं। हालांकि टॉयलेट ट्रेनिंग (toilet training in hindi) के दौरान कभी-कभार उसे प्रेरित करने के लिए छोटे-मोटे तोहफे देने में कोई बुराई नहीं है। रोज़ाना टॉफी या खिलौने देने के बजाय आप बच्चे की सफलता पर उसकी तारीफ कर सकते हैं और उसे गोद मे लेकर प्यार कर सकते हैं। इससे उसे ज्यादा अच्छा लगेगा।

5. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: टॉयलेट सीट पर बिठाने से बच्चा उसका उपयोग करना सीख जाएगा।

(Toilet seat par bithane se bacha uska upyog karna sikh jayega)

bache ko baithane se khud sikh jayega

सच्चाई- इस मिथक के अनुसार बच्चे को नियमित रूप से टॉयलेट सीट या पॉटी सीट पर बिठाने से वो वहां शौच करना सीख जाता है। यह सच नहीं है। असल में, टॉयलेट सीट पर जबरदस्ती बिठाने से बच्चा टॉयलेट जाने से डरने लग सकता है और इसका विरोध करने लग सकता है।

अगर आपका बच्चा टॉयलेट पर एक या दो बार बैठ भी जाता है, तो केवल इसी से वो इसका सही उपयोग करना नहीं सीख जाएगा। उसे सिखाने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि उसे उसके शरीर के संकेतों को पहचानना सिखाया जाए। यह सीखने के बाद बच्चा खुद-ब-खुद समझने लगेगा कि उसे कब पेशाब आया है या कब मलत्याग करना है और वो शौचालय का उपयोग करना जल्दी सीख पायेगा।

6. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: आप तीन दिनों में बच्चे को टॉयलेट ट्रेनिंग दे सकते हैं।

(Aap tin dino me bache ko toilet training de sakte hai)

3 din me potty training

सच्चाई- यह मिथक पूरी तरह से सच नहीं है। आप तीन दिनों में बच्चे को शौचालय जाना सिखाने की शुरुआत कर सकते हैं, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो तीन दिन में शौचालय के इस्तेमाल में माहिर हो जाएगा। इसके लिए उसे काफी चीज़ें सीखनी होती हैं, जैसे - शरीर के संकेत समझना, अपनी बात आपको समझा पाना, शौचालय का उपयोग सीखना, मांसपेशियों को नियंत्रित करना आदि। सामान्य रूप से, यह सब केवल तीन दिनों में होना संभव नहीं है। इसलिए जल्दबाज़ी करने के बजाय, बच्चे को धीरे धीरे उसके हिसाब से सीखने दें।

7. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: शौचालय का उपयोग सिखाने के लिए बच्चे को हर आधे घण्टे में शौचालय लेकर जाएं।

(Bache ko toilet training dene ke liye har aadhe ghante me toilet lekar jaye)

har adhe ghante me potty training

सच्चाई- कुछ लोग मानते हैं कि बच्चे को टॉयलेट ट्रेनिंग (potty training in hindi) देने के दौरान आपको उसे हर आधे घण्टे बाद टॉयलेट में लेकर जाना चाहिए। यह तरीका सही नहीं है, यह केवल एक मिथक है। इससे बच्चा असमंजस में पड़ सकता है और नाराज़ भी हो सकता है। अगर उसका डायपर एक से दो घण्टे के लिए सूखा रह सकता है, तो उसे हर आधे घण्टे में पेशाब करवाने के लिए टॉयलेट में लेकर जाने की ज़रूरत नहीं है।

इसके बजाय अपने बच्चे की दिनचर्या के हिसाब से नियम बनाएं और उनका पालन करें। जब आप उसे पेशाब या पॉटी लगने पर ही शौचालय लेकर जाएंगे, तो उसे यह साफ तौर पर समझ आएगा कि शौचालय का उपयोग किसलिए किया जाता है।

8. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: दो साल का होने तक बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग हो जानी चाहिए।

(Do saal ka hone tak bache ki toilet training ho jani chahiye)

2 sal ke bache ki potty training

सच्चाई- कुछ लोग मानते हैं कि दो साल का होने तक बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग (toilet training in hindi) पूरी हो जानी चाहिए, वरना बाद में उसे सीखने में मुश्किल होगी। यह केवल एक मिथक है, यह सच नहीं है। शौचालय का इस्तेमाल करना बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर निर्भर करता है और सभी बच्चे अलग ढंग से बढ़ते हैं। इसका मतलब यह है कि हर बच्चा अपने विकास के अनुसार उचित समय पर शौचालय का उपयोग करना सीखता है।

इस वजह से कुछ बच्चे दो साल के होने से पहले ही टॉयलेट का इस्तेमाल करना सीख लेते हैं, जबकि कुछ बच्चों को यह सीखने में एक या दो साल का समय और लगता है। दोनों ही स्थितियां सामान्य है। हालांकि कुछ तरीकों से बच्चे को टॉयलेट ट्रेनिंग (potty training in hindi) देने में आपकी मदद हो सकती है, जैसे - उसे कुछ समय के लिए कमर के नीचे कपड़े ना पहनाना, अपने साथ टॉयलेट के अंदर ले जाना आदि।

हम सभी जानते हैं कि बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग (toilet training in hindi) कोई आसान काम नहीं है, इसलिए इसे आसान बनाने के उपाय ढूंढना जायज़ है। मगर, इस दौरान किसी भी उपाय को अपनाने से पहले एक बार अनुभवी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। साथ ही ब्लॉग में बताए गए मिथकों पर विश्वास ना करें। अपने बच्चे को सही तरीकों से शौचालय का उपयोग करना सिखाना जारी रखें और जल्दी ही वो सब सीख जाएगा।

इस ब्लॉग के विषय - 1. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: लड़कियां लड़कों की तुलना में जल्दी सीखती हैं। (Ladkiya ladko ki tulna me jaldi sikhti hai),2. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: जब बच्चा तैयार होगा तो अपने आप शौचालय का उपयोग करना सीख लेगा। (Jab bachha teyar hoga to apne aap toilet use karna sikh lega),3. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: एक बार टॉयलेट का इस्तेमाल सीखने के बाद बच्चा कभी कपड़े खराब नहीं करेगा। (Ek baar toilet training lene ke baad bacha kabhi kapde gile nahi karega),4. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: बच्चे को सिखाने के लिए आपको टॉफी-खिलौने जैसे ईनाम देने चाहिए। (Bache ko sikhane ke liye apko use toffee aur khilaune dene chahiye),5. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: टॉयलेट सीट पर बिठाने से बच्चा उसका उपयोग करना सीख जाएगा। (Toilet seat par bithane se bacha uska upyog karna sikh jayega),6. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: आप तीन दिनों में बच्चे को टॉयलेट ट्रेनिंग दे सकते हैं। (Aap tin dino me bache ko toilet training de sakte hai),7. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: शौचालय का उपयोग सिखाने के लिए बच्चे को हर आधे घण्टे में शौचालय लेकर जाएं। (Bache ko toilet training dene ke liye har aadhe ghante me toilet lekar jaye),8. बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग के मिथक: दो साल का होने तक बच्चे की टॉयलेट ट्रेनिंग हो जानी चाहिए। (Do saal ka hone tak bache ki toilet training ho jani chahiye)
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