प्रेगनेंसी में यूटेराइन फाइब्रॉयड: लक्षण, कारण और बचाव के उपाय (pregnancy me uterine fibroids: lakshan, karan aur bachav ke upay)

प्रेगनेंसी में यूटेराइन फाइब्रॉयड: लक्षण, कारण और बचाव के उपाय (pregnancy me uterine fibroids: lakshan, karan aur bachav ke upay)

गर्भावस्था के दौरान गर्भवती को कई छोटी-बड़ी समस्याओँ का सामना करना पड़ता है, यूटेराइन फाइब्रॉयड भी इनमें से एक है। भारत में केवल 0.5 प्रतिशत महिलाओं को ही गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड या गर्भाशय में रसौली होती है, इसीलिए इसे सामान्य या आम नहीं माना जाता है।

कुछ मामलों में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) प्रेगनेंसी के साथ-साथ बढ़ने लगती है, जिससे गर्भवती को कई जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। ज्यादातर महिलाओं का कहना है कि गर्भाशय में रसौली के साथ गर्भावस्था का अनुभव अच्छा नहीं होता है, क्योंकि इससे उनके पेट में बहुत ज्यादा दर्द होता है।

कुछ महिलाओं को प्रेगनेंसी में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) से रक्तस्राव होने का खतरा भी हो सकता है। हम आपको इस ब्लॉग में गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड से जुडी सभी जानकारियां दे रहे हैं।

1. प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली क्या होती है?

(pregnancy me garbhashay me rasauli kya hoti hai)

garbhashay me rasauli

कुछ महिलाओं की बच्चेदानी की दीवार में मांस की एक गांठ जैसी संरचना बन जाती है, जिसे गर्भाशय में रसौली (garbhashay me rasauli) या यूूटेराइन फाइब्रॉयड कहा जाता है। चिकित्सकीय भाषा में इसे लिओमायोमा (leiomyoma in hindi) और मायोमा (myoma in hindi) भी कहा जाता है। गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय में एक या एक से अधिक रसौली हो सकती हैं और इनका आकार सेब के बीज या अंगूर की तरह हो सकता है।

आमतौर पर प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड ट्यूमर की तरह बढ़ते हैं। इनसे कैंसर होने का ख़तरा नहीं होता, लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान इनके आकार में वृद्धि हो सकती है। डॉक्टर कहते हैं कि प्रेगनेंसी के दौरान रसोली की वृद्धि एस्ट्रोजेन हार्मोन (estrogen hormone in hindi) बढ़ने की वजह से होती है।

2. प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली कितने प्रकार की होती हैं?

(pregnancy me uterine fibroids kitne prakar ke hoti hai)

pregnancy me uterine fibroids ke prakar

प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) कई तरह की होती हैं, जिनका निर्धारण उनकी स्थिति के आधार पर किया जाता है। इसके प्रकार निम्न हैं-

  • इन्ट्राम्युरल फाइब्रॉयड (intramural fibroids in hindi)- महिलाओं में इन्ट्राम्युरल फाइब्रॉयड सबसे ज्यादा पाए जाते हैं। आमतौर पर ये फाइब्रॉयड गर्भाशय की दीवार पर विकसित होते हैं। इनका आकार अन्य फाइब्रॉयड की तुलना में ज्यादा बड़ा हो सकता है और ये बच्चेदानी में पूरी तरह से फैल सकते हैं।

  • सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड (submucosal fibroids in hindi)- सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड बच्चेदानी की परतों के सबसे निचले स्तर यानी एंडोमेट्रियल स्तर (endometrial lining in hindi) पर विकसित होता है। प्रेगनेंसी के दौरान यह गर्भपात का कारण बन सकता है।

  • सबसेरोसल फाइब्रॉयड (subserosal fibroids in hindi)- सबसेरोसल फाइब्रॉयड गर्भाशय की बाहरी परत पर विकसित होता है और पेल्विस क्षेत्र तक फैला होता है। इसका आकार बढ़ने की वजह से मूत्राशय पर दबाव पड़ता है।

  • सर्वाइकल फाइब्रॉयड (cervical fibroids in hindi)- सर्वाइकल फाइब्रॉयड सर्विक्स (cervix in hindi) के पास विकसित होता है। इसका आकार बढ़ने पर यह सर्विक्स को पूरी तरह से ढक सकता है, जिससे गर्भवती को प्रसव में परेशानी हो सकती है।

  • पेडन्क्युलेट फाइब्रॉयड (pedunculated fibroids in hindi)- पेडन्क्युलेट फाइब्रॉयड दो तरह के होते हैं-

    • पेडन्क्युलेट सबसेरोसल फाइब्रॉयड गर्भाशय के बाहर विकसित होता है।
    • पेडन्क्युलेट सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड गर्भाशय के अंदर विकसित होता है।

अगर इनका आकार न बढ़े, तो ये अन्य यूटेराइन फाइब्रॉयड की तुलना में कम हानिकारक होते हैं।

3. प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड के लक्षण क्या होते हैं?

(pregnancy me uterine fibroids ke lakshan kya hote hai)

pregnancy me uterine fibroids ke lakshan

गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) होने के लक्षण कई अन्य समस्याओं के लक्षणों से काफी मिलते- जुलते हैं, जिसके कारण इसकी पहचान कर पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। मगर, प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली होने के लक्षणों की जानकारी बहुत जरूरी है। इसके कुछ आम लक्षण नीचे बताए गए हैं-

  • प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली के लक्षण: योनि से रक्तस्राव होना- अचानक योनि से रक्तस्राव होना प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) का लक्षण हो सकता है। यूटेराइन फाइब्रॉयड के बढ़ने की स्थिति में आस पास की नसों पर इसका दबाव पड़ता है और नसें क्षतिग्रस्त हो जाती है, जिसकी वजह से योनि से रक्तस्राव हो सकता है।

  • गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड के लक्षण: पीठ में दर्द होना- अक्सर पीठ में दर्द होना बच्चेदानी में रसौली होने का संकेत हो सकता है। पेडन्क्युलेट सबसेरोसल फाइब्रॉयड, गर्भाशय के बाहर विकसित होने की वजह से इसका दबाव रीढ़ की हड्डी पर पड़ता है और इससे पीठ में दर्द हो सकता है।

  • प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली के लक्षण: पैरों में दर्द होना- अक्सर पैरों में दर्द रहना प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) होने का लक्षण हो सकता है। रसोली के बढ़ते आकार से पैरों की नसों पर इसका दबाव पड़ता है, जो पैरों के दर्द का कारण बनता है।

  • गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड के लक्षण: पेट के निचले हिस्से में ऐंठन या दर्द होना- पेट के निचले हिस्से में ऐंठन और दर्द होना, बच्चेदानी में रसौली का लक्षण हो सकता है। सर्वाइकल फाइब्रॉयड से पेल्विस क्षेत्र पर दवाब पड़ता है, जिससे महिला को पेट के निचले हिस्से में दर्द महसूस हो सकता है।

  • गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड के लक्षण: पेशाब करते वक्त दर्द होना- बच्चेदानी में रसौली होने पर गर्भवती महिला को पेशाब करते वक्त दर्द महसूस हो सकता है। गर्भाशय में फाइब्रॉयड बढ़ने की स्थिति में उसके मूत्राशय दबाव पर पड़ता है, जिसकी वजह से उसे पेशाब करते वक्त दर्द महसूस हो सकता है।

  • गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड के लक्षण: बार-बार पेशाब आना- अगर किसी गर्भवती महिला को बार-बार पेशाब आ रहा है, तो यह प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) का लक्षण हो सकता है। यूटेराइन फाइब्रॉयड बढ़ने की स्थिति में उसके मूत्राशय पर दबाव पड़ता है, जिसकी वजह से उसे बार-बार पेशाब आता है।

  • प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली के लक्षण: कब्ज होना- यूं तो गर्भावस्था में कब्ज (constipation during pregnancy in hindi) होना आम होता है। लेकिन कब्ज बढ़ना या लगातार कई दिनों तक कब्ज रहना प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) होने का लक्षण हो सकता है। गर्भाशय के निचले हिस्से में फाइब्रॉयड के बढ़ने की वजह से गर्भवती को कब्ज हो सकती है।

ध्यान रखें- ऊपर बताए गए सभी लक्षण प्रेगनेंसी के दौरान किसी अन्य समस्या के संकेत हो सकते हैं, इसीलिए इनसे जुडी किसी प्रकार की आशंका के लिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

4. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड क्यों होते हैं?

(pregnancy me uterine fibroids kyun hote hain)

pregnancy me uterine fibroids

हालांकि प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) के होने के सटीक कारणों का पता अब तक नहीं चल पाया है। लेकिन डॉक्टरों के अनुसार निम्न कारणों से गर्भवती महिला को बच्चेदानी में रसौली होने की आशंका बढ़ सकती है।

  • महिला की उम्र 35 वर्ष या उससे ज्यादा होना- अगर कोई महिला 35 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र में गर्भधारण करती है तो उसे गर्भाशय में रसौली हो सकती है।

  • महिला का वज़न ज्यादा होना- गर्भधारण करने वाली महिला का वज़न ज्यादा होने से उसे गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) हो सकता है।

  • गर्भनिरोधक दवाइयां और इंजेक्शन लेना- प्रेगनेंसी से पहले, ज्यादा मात्रा में गर्भनिरोधक गोलियां लेने या गर्भनिरोधन के अन्य उपाय जैसे इंजेक्शन आदि लेने की वजह से भी, गर्भवती को गर्भाशय में रसौली हो सकती है।

5. प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड की जांच कैसे की जाती है?

(pregnancy me uterine fibroids ki janch kaise ki jati hai)

pregnancy me uterine fibroids ki janch

गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) की आशंका होने पर डॉक्टर इसके लक्षणों के आधार पर जांच शुरू करते हैं। दो अलग अलग प्रक्रियाओं से प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली की सटीक स्थिति की जांच की जाती है, जो नीचे बताई जा रही हैं-

  • आमतौर पर गर्भवती महिला की बच्चेदानी में रसौली की जांच अल्ट्रासाउंड की मदद से की जाती है। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्भाशय और उसमें विकसित ट्यूमर के आकार की जांच करते हैं।

  • कुछ मामलों में गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड होने की स्थिति में एमआरआई यानी मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग (MRI in hindi) से इसके आकार और वजन की जांच की जाती है।

6. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड का इलाज कैसे किया जाता है?

(pregnancy me uterine fibroids ka ilaj kaise kiya jata hai)

pregnancy me uterine fibroids ka ilaj

गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड का इलाज कई उपायों से किया जा सकता है, लेकिन इलाज की विभिन्न प्रक्रियाओं से गर्भ में पल रहे शिशु की जान को ख़तरा हो सकता है, इसीलिए गर्भावस्था के दौरान रसोली के इलाज को सीमित रखा गया है। इस दौरान डॉक्टर महिलाओँ को दर्द कम करने के लिए दर्द निवारक गोलियां दे सकते हैं, इसके साथ ही वो उन्हें ढेर सारा पानी पीने और पर्याप्त आराम करने की सलाह देते हैं।

हालांकि कुछ गंभीर मामलों में फाइब्रॉयड का आकार और वजन बढ़ने पर मायोमैक्टॉमी (myomectomy in hindi) सर्जरी की जाती है। आमतौर पर यह सर्जरी गर्भावस्था के 20 वें हफ्ते (पांचवें महीने) के बाद की जाती है। डॉक्टर कहते हैं कि गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) अगर बच्चेदानी की दीवार के बाहर या उसके अंदर हो तो मायोमैक्टॉमी की प्रक्रिया से उसे बाहर निकाला जा सकता है। इस प्रक्रिया से शिशु को नुकसान होने की आशंका बेहद कम होती है।

7. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड से बचने के उपाय क्या हैं?

(pregnancy me uterine fibroids se bachne ke upay kya hai)

pregnancy me uterine fibroids se bachne ke upay

डॉक्टरों का कहना है कि यूं तो प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसोली (uterine fibroids during pregnancy in hindi) होने को रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ सामान्य उपायों को अपना कर इसके बढ़ने की संभावना को कम ज़रूर किया जा सकता है। रसोली से बचाव के कुछ सामान्य उपाय नीचे बताए गए हैं-

  • रोज़ाना व्यायाम करें: अगर किसी महिला को प्रेगनेंसी से पहले या इस दौरान रसोली की समस्या है, तो रोज़ाना व्यायाम करने से इसके बढ़ने की संभावना को कम किया जा सकता है।

  • स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं: प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) से बचने के लिए अपनी जीवन शैली में बदलाव लाएं और अपनी दिनचर्या में सुधार करें।

  • वज़न नियंत्रित रखें: प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (pregnancy me garbhashay me rasauli) के बढ़ने की संभावना को कम करने के लिए महिलाओं को अपना वज़न नियंत्रण में रखना बेहद जरूरी होता है।

  • शराब से परहेज करें: गर्भाशय में रसौली से बचने के लिए महिलाओं को शराब से परहेज करना चाहिए, क्योंकि इससे इसके बनने और बढ़ने की आशंका ज्यादा होती है।

  • ज्यादा लाल मांस न खाएं: विशेषज्ञ मानते हैं कि ज्यादा लाल मांस खाने से प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) हो सकती है, इसीलिए जितना हो सके लाल मांस खाने से परहेज करें।

  • गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल न करें: प्रेगनेंसी में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) से बचने के लिए किसी भी प्रकार के गर्भनिरोधकों (जैसे हार्मोनल गोलियां, इंजेक्शन आदि) का इस्तेमाल न करें। गर्भनिरोधकों के ज्यादा उपयोग करने से महिला को गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉइड होने की आशंका बढ़ जाती है।

8. प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड होने से क्या जोखिम होते हैं?

(pregnancy me uterine fibroids hone se kya jokhim hote hai)

pregnancy me uterine fibroids ke jokhim

गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) अनियंत्रित रूप से बढ़ने से मां और शिशु को कुछ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं। प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को रसोली होने की स्थिति में उसे निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है-

  • योनि से रक्तस्राव- प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) का आकार और वजन बढ़ने पर महिला की योनि से अत्यधिक रक्तस्राव (bleeding during pregnancy in hindi) हो सकता है।

  • गर्भपात- प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) के आकार में ज्यादा वृद्धि होने की वजह से गर्भवती महिला का गर्भपात (miscarriage in hindi) हो सकता है।

  • शिशु के विकास में रुकावट- कुछ मामलों में फाइब्रॉयड शिशु के साथ-साथ बढ़ने लगता है। ऐसे में प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड होने से गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में बाधा आ सकती है।

  • समयपूर्व डिलीवरी- गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) असामान्य रूप से बढ़ जाने की स्थिति में गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में बाधा आती है और उसे चोट लगने की आशंका होती है। इसके साथ ही इससे समयपूर्व डिलीवरी (premature delivery in hindi) भी हो सकती है।

  • शिशु की अवस्था में बदलाव- गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) का आकार और वजन बढ़ने की वजह से महिला के गर्भ में पल रहे शिशु की अवस्था बदल सकती है। इससे शिशु गर्भ में आड़ा (transverse position in hindi) या सीधा (पैर नीचे व सिर ऊपर की तरफ) हो सकता है। डॉक्टर गर्भ में शिशु के सीधे होने को ब्रीच अवस्था (breech position in hindi) कहते हैं और सीधे होने को ट्रांसवर्स पोजिशन (transverse position in hindi) कहते हैं।

  • प्रसव पीड़ा में रुकावट- कभी-कभी प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) सर्विक्स के समीप विकसित होकर उसे ढक सकता है, जिससे महिला की प्रसव पीड़ा में रुकावट आ सकती है। गंभीर परिस्थितियों में यह जानलेवा भी हो सकता है।

  • सिजेरियन डिलीवरी- गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) का आकार और वजन बढ़ने की वजह से गर्भवती को अत्यधिक रक्तस्राव हो सकता है। ऐसा होने पर गर्भवती महिला की आपातकालीन सिजेरियन डिलीवरी (emergency cesarean delivery in hindi) करानी पड़ सकती है।

इसके अलावा रसौली की वजह से शिशु के उचित अवस्था में यानी सर के बल न होने पर भी, डॉक्टर पूर्वनियोजित ऑपरेशन डिलीवरी (pre-planned cesarean delivery in hindi) करवाने की सलाह देते हैं।

9. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड होने पर क्या सावधानी बरतें?

(pregnancy me uterine fibroids hone par kya savdhani barte)

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जांच के बाद प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली में किसी प्रकार की वृद्धि पाई जाने पर, गर्भवती महिला को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। इस दौरान गर्भवती को निम्न सावधानियां बरतनी चाहिए-

  • अगर आपको गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड है, तो ज्यादा से ज्यादा आराम करें।
  • अपने शरीर में पानी की कमी न होने दें और पूरे दिन भरपूर मात्रा में पानी पीएं। डॉक्टर हर गर्भवती महिला को दिन में कम से कम आठ गिलास पानी पीने की सलाह देते हैं।
  • गर्भावस्था के बढ़ते हफ्तों में रसोली की वजह से महिला को रक्तस्राव हो सकता है। ऐसा होने पर इसकी जानकारी अपने डॉक्टर को दें, ताकि समय रहते इसका इलाज किया जा सके।
  • गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) के बढ़ने से गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसीलिए शिशु के विकास पर भी नज़र रखें।
  • प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) होने और बढ़ने की नियमित जांच करवाएं और डॉक्टर की सलाह से इसे नियंत्रण में रखने की कोशिश करें।

प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड (uterine fibroids during pregnancy in hindi) होना आम नहीं होता है और ज्यादातर महिलाओं को इसके होने की जानकारी नहीं होती है। इसकी वजह से न केवल गर्भवती को शारीरिक परेशानियां होती है, बल्कि इससे उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए प्रेगनेंसी के दौरान समय रहते बच्चेदानी में रसोली का इलाज करवाना बेहद जरूरी है।

इस लेख में प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड से जुड़ी सभी जानकारियां दी गई है। इसके अलावा प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली (pregnancy me garbhashay me rasauli) के लक्षण और इससे जुड़ी किसी अन्य समस्या की जानकारी के लिए अपने डॉक्टर की सलाह लें।

इस ब्लॉग के विषय - 1. प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली क्या होती है? (pregnancy me garbhashay me rasauli kya hoti hai),2. प्रेगनेंसी में गर्भाशय में रसौली कितने प्रकार की होती हैं? (pregnancy me garbhashay me rasauli kitne prakar ke hoti hai),3.प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड के लक्षण क्या होते हैं? (pregnancy me uterine fibroids ke lakshan kya hote hai),4. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड क्यों होते हैं? (pregnancy me uterine fibroids kyun hote hain),5. प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड की जांच कैसे की जाती है? (pregnancy me uterine fibroids ki janch kaise ki jati hai),6. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड का इलाज कैसे किया जाता है? (pregnancy me uterine fibroids ka ilaj kaise kiya jata hai),7. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड से बचने के उपाय क्या हैं? (pregnancy me uterine fibroids se bachne ke upay kya hai),8. प्रेगनेंसी मेें यूटेराइन फाइब्रॉयड होने से क्या जोखिम होते हैं? (pregnancy me uterine fibroids hone se kya jokhim hote hai),9. गर्भावस्था में यूटेराइन फाइब्रॉयड होने पर क्या सावधानी बरतें? (pregnancy me uterine fibroids hone par kya savdhani barte)
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